कोविड – 19 वैज्ञानिकों के अनुसार गर्भवती महिला मैं से कोरोना वायरस नवजात शिशु में ट्रांसफर नहीं होता

कोरोना वायरस के विश्व भर के खौफ के बीच कुछ अच्छी खबर बाहर आई है. चीनी अन्वेषको ने यह घोषित किया है वायरल का इन्फेक्शन गर्भवती में से नवजात शिशु को जन्म के समय ट्रांसमिट नहीं होता |गर्भावस्था के दौरान कोरोना वायरस से संक्रमित माता द्वारा यह रोग नवजात शिशु में जाता है या नहीं करने के लिए पिछले महीने में दो अभ्यास किए गए जिसका आर्टिकल frontiers in pediatrics जर्नल में प्रकाशित किया गया है.

प्रथम अध्ययन में चारों गर्भवती महिलाओं पर किया गया. यह चारों महिलाएं वायरस से संक्रमित थी इन महिलाओं ने चीन के वुहान शहर में यूनियन हॉस्पिटल में नवजात शिशुओं को जन्म दिया. चीन के हुबेई प्रांत के बुहान शहर में कोरोनावायरस सबसे अधिक प्रभावित है.

हुआ सॉन्ग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के अन्वेषक के अनुसार नवजात शिशु में किसी भी प्रकार की बुखार अथवा खांसी जैसे कोविड- 19 के कोई भी लक्षण विकसित नहीं थे. हालांकि शुरुआत में इन सभी नवजात शिशु को ICU में आइसोलेशन में रखा गया था. इसके उपरांत अन्य 9 गर्भवती महिलाएं, जो कोरोना वायरस से संक्रमित थी, उन पर भी यह अध्ययन किया गया. अन्वेषको को इन नवजात शिशु में भी संक्रमण के कोई लक्षण दिखाई नहीं दिए.

हुअजोन्ग  यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के डॉक्टर. यान ली के अनुसार सुनामी से आंख डिलीवरी सिजेरियन एक डिलीवरी नॉर्मल हुई थी. परंतु एक भी बच्चे में यह इन्फेक्शन नहीं पाया गया.

मजेस्टिक गर्भसंस्कार का मंतव्य :

अभी के हालात और अन्वेषण अनुसार कोरोना वायरस की कोई निश्चित दवा तथा वैक्सीन उपलब्ध नहीं है परंतु इस वायरस से डर नहीं, बल्कि सावधानी रखने की जरूरत है. गर्भवती महिलाएं अपना समय आनंद युक्त और सकारात्मक रहकर व्यतीत करें. अनावश्यक लोक संपर्क टाले. विभिन्न प्रक्रियाएँ,जैसे कि, गर्भ संवाद, सकारात्मक सूचन, प्रार्थना, बोध कथा, पंच इंद्रिय का श्रेष्ठ विकास हो ऐसी एक्टिविटी, सत्संग एक्टिविटीज, ब्रेन एक्टिविटी इत्यादि हर रोज करते रहे. खुश और सकारात्मक रहने से आपकी रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ेगी और किस मजबूरी के समय को हम एक शेख अवसर में परिवर्तित कर पाएंगे. उत्तम गुणों वाले संतान को जन्म देने के लिए गर्भवती स्त्री की श्रेष्ठ जीवन शैली – इसी को कहते हैं गर्भ संस्कार.

आपकी गर्भावस्था आनंददायक, सकारात्मक और श्रेष्ठ रहे ऐसी परमेश्वर से प्रार्थना.

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लेख संदर्भ: https://www.timesnownews.com/health/article/covid-19-scientists-say-coronavirus-not-transmittable-from-pregnant-mothers-to-newborns/565103

गर्भावस्था – एक अलौकिक सुख

जब एक औरत माँ बनने वाली होती है, वो समय उसकी जिंदगी का सबसे रोमांचित समय होता है । एक ही पल में जैसे उसकी पूरी जिंदगी बदल जाती है । भावनाओं में बदलाव, विचारो में बदलाव, खाने-पीने में बदलाव, घुमने-फिरने में बदलाव और आस-पास का माहोल भी अचानक बदला-बदला महसूस होता है । परिवार वाले भी ध्यान रखने के लिए सलाह-सूचन देना शुरू कर देते है । जाने-अनजाने यह समय अद्‌भूत सुख के साथ कुछ उलसने भी लेकर आता है । शरीर में होनेवाले असाधारण । बदलाव की वजह से बेचेनी, स्नायुओ में खिंचाव जैसी छोटी-मोटी शारीरिक और मानसिक परेशानियाँ भी रहेती है ।

A mom with a baby in womb

यह समय चिंता का नहीं, बल्कि आनेवालें बच्चे के सर्वांगी विकास के लिए चिंतन करने का है । क्योंकि विज्ञान भी कहता है कि बच्चे के दिमाग का ८०÷ विकास माता के गर्भ से ही होता है । गर्भ में बेटा है या बेटी यह चिंता किए बिना, आनेवाला बच्चा मेरी संतान है जो अभी मेरे गर्भ में पल रहा है यह अलौकिक सुख का अनुभव करने का है । गर्भावस्था के इस सुंदर सफर में माँ बननेवाली हर स्त्री उच्चकोटी की संतान को जन्म दे, उसके लिए मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के ध्यान रखने की बहोत जरुरत है ।

जिस तरह हमारे घर के निर्माण करने में प्लानिंग और सभी सामग्री जैसे की सिमेन्ट, पाणी, इंट की जरुरत होती है वैसे ही गर्भ में पल रहे बच्चे के सर्वोत्तम विकास के लिए उच्च विचारो, समतोल आहार, ध्यान, योग और कुछ नियमों का पालन करने की जरुरत होती है ।सचमुच वह अद्‌भूत समय है, यह गर्भावस्था । नाजुक परिस्थिति में भी अलौकिक सुख का अनुभव कने का मौका इश्वर ने सिर्फ स्त्री को ही दिया है ।

गर्भसंस्कार, एक अद्‌भूत रहस्य (दान के घर देव (भक्त) का जन्म)

एक पुनारी प्रचलित कहावत है, कि यदि माता निर्धार करे तो यह कवाहत को भी गलत कर सकती है । और इतिहास के कई प्रसंग इस बात को साबित कर सकते है । माता के मनोबल और गर्भावस्था में किए संस्कारो के सिंचन ने सचमुच चमत्कार कर दिखाएँ है । इस अनुसंधान में आज हम बात करेंगे ।

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भक्त प्रहलाद का जन्म दानवकुल में हुआ था । इस बात से हम सब वाकेफ है । दानवकुल में जन्म लेने के बावजूद उनके गुण देव समान थे । एसा कैसे ? क्या कारण है ? जिसने दानवकुल में प्रहलाद को देव जैसे गुणो का स्वामी बनाया । उत्तर है ‘गर्भसंस्कार’ । गर्भसंस्कार मतलब गर्भवती स्त्री द्वारा बच्चे को गर्भ में ही किया जानेवाला संस्कारो का सिंचन ।

गर्भावस्था दौरान भक्त प्रहलाद की मातृश्री कयाधु नारदमुनि के आश्रम में रहते थे । उनका संपूर्ण समय भगवान नारायण के मंत्र जाप और प्रभु की कथा-वार्ता सुनने में व्यतीत रहेता था । आश्रम का वातावरण बेहद शांत और भक्तिमय था । भोजन भी शुद्ध और सात्विक मिलता था । ऐसे भक्तिमय वातावरण का प्रभाव उसके गर्भस्थ शिशु पर हुआ जिसके फल स्वरूप भक्त प्रहलाद में भक्ति के बीज संस्कारित हुए और भारतवर्ष को श्रेष्ठ भक्त की भेंट मिली । सगर्भा स्त्री जैसे माहोल में रहे और जैसा चिंतन करे उसकी बच्चे पर होनेवाली असर समझने के लिए यह एक श्रेष्ठ उदाहरण है ।

गर्भसंस्कार की वजह से ही शायद राक्षस हिरण्यकश्यपु का पुत्र भक्त प्रहलाद देवतुल्य कहलाते थे ।

सचमुच गर्भावस्था दौरान हर एक स्त्री बच्चे के शारिरीक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास पर भी ध्यान केन्द्रित करें तो नब्बे वर्ष का काम नव महिने में हो जाए और चाहे वैसी दिव्य आत्मा को जन्म देकर इस विश्व को उत्तम संतान की भेंट दे सकती है ।

गर्भावस्था और भोजन

‘माता’ बनना हर स्त्री के जीवन का सबसे रोमांचक और अविस्मरणिय अनुभवो से भरा समय है । परंतु इस समय को और भी सुंदर बनाया जा सकता है, जो वैदिक और वैज्ञानिक तरीके से सिध्ध हुई कुछ बातो का ध्यान रखा जाएँ ।

वैज्ञानिक प्रयोगो से भी यह साबित हुआ हे कि गर्भस्थ स्त्री जो भी भोजन ग्रहण करती है, उसकी गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी शारीरिक और मानसिक असर होता है । हमारें यहाँ पूरानी कहावत है “जैसा अन्न वैसा मन” इसलिए तो रानी कौशल्या ने अपने गर्भावस्था के दौरान राजमहेल का भोजन का त्याग किया । अहोहो….. यह क्या । राजमहेल का भोजन का त्याग । महाराज दशरथ चिंता में पड़ गए । दशरथ महाराज को जान-पडताल करते यह पता चला कि रानी ने महल के भोजन का त्याग इसलिए किया कि महल में तो समग्र राज्यमें से अन्नसामग्री संचित की जाती है । यह अन्न सामग्री किसने, कैसे और कैसी भावना से दिया उसका कोई पता नहीं और यह अन्न ग्रहण करने से आनेवाले बच्चे पर विपरीत असर पड़ सकता है । कौशल्या राणीने समग्र गर्भावस्था दौरान ऋषिवर वशिष्ठ के आश्रम से आया हुआ भोजन ही ग्रहण किया । उसके बदले में राणी ने आश्रम की कन्याओं को विद्यापाठ कराया । इस पर से कह सकते है कि रानी ने अपनी मेहनत के फल स्वरूप प्राप्त सात्विक भोजन ही ग्रहण किया । एसा सात्विक और मेहनत से प्राप्त भोजन ग्रहण करने से बच्चे के मन का सात्विक विकास हुआ जो शायद राजमहल के भोजनन से न होता । इस तरह श्रीराम का श्रेष्ठ विकास हुआ ।

कितनी पवित्र और शुद्ध भावना । क्या आज के आधुनिक युग में एसी विचारधारा की जरुरत नहीं है । बाहर के कोई भी रेस्टोरां या भारी बना हुआ भोजन किस तरह और कैसी भावना से बना होगा यह कोई भी निश्चित नहीं बता सकता । जो आज भी गर्भवती स्त्री निर्धार करे कि वह अपने समग्र गर्भावस्था दौरान घर में पका हुआ शुद्ध और सात्विक भोजन ही ग्रहण करेगी तो आनेवाले बच्चे के तन और मन पर निश्चित रुप से फायदा होगा ।

हा, माँ जो निर्धार करे वह कर सकती है

मातृत्व शब्द सुनते ही ममता का अनुभव होता है । पर यह मातृत्त्व केवल नव महिने की भावनाओं का अवसर नहीं है एक औरत जब बाल्यावस्था में होती है तब से ही वह माँ होती है । कभी खिलोने की गुडियाँ पर प्रेम बरसाती हुई, तो कभी अपने भाई-बहन पर, तो कभी तो अपने पिता पर । आज के वुमन एम्पावरमेन्ट के जमाने में हर स्त्री को यह याद रखने की जरुरत है कि उपरवाले ने तुम्हे स्त्री होने के गौरव प्रदान किया है । सर्जन करने की क्षमता देकर पर्मेश्वर आपको उसके समकक्ष होने का दरज्जा दिया है । एक आत्मा दूसरी आत्मा को महसूस कर सके, और उस आत्मा को शरीर दे सके एसा अलौकिक कार्य मात्र भगवान और औरत ही कर सकते है । गर्भ में पल रही आत्मा मेरी संतान है । वाह… क्या अद्‌भूत अनुभूति है । मातृत्व दुनिया की हर एक औरत के लिए एक जैसा ही आनंददायी अनुभव है, फिर चाहे वो धनवान हो या गरीब ।

श्रेष्ठ, सशक्त, गुणवान और बुद्धिमान संतान जगत को भेंट देना वो एक औरत की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है । प्राचीन युग में निर्बल संतान को जन्म देना – वह भी एक पाप कहलाता था । इसलिए संतान तेजस्वी, शूरवीर और पराक्रमी हो उसके लिए गर्भावस्था दौरान ही खास प्रयास किए जाते है । आज की नारी तो शिक्षित आधुनिक और पुरुष के समकक्ष है । आहार, विहार और विचार में जो संयम रखा जाए और निश्चित संस्कारो का सिंचन गर्भावस्था से ही किया जाए तो माता विश्व को उच्चकोटी की संतान निश्चय ही भेंट दे सकती है ।

श्रीकृष्ण की बाते माता सुभद्रा के गर्भ में ही सुनकर, सीखकर क्या छोटी उम्र में ही अभिमन्यु ने चक्रव्यूह को नही भेदा । यदि माता जीजाबाई ने निर्धार न लिया होता कि मेरे गर्भ का बालक शूरवीर और पराक्रमी बने, तो शिवाजी जैसे शूरवीर भारत देश को मिल पाते ? पूतलीबाई ने संतान महात्मा गाँधी से लेकर हीराबा ने सुपुत्र ऐसे भारत के वर्तमानकालिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रभाई मोदी सहित सभी महान हस्तीयाँ के जीवन में झाँकी की जाए तो पता चलता है कि उसके श्रेष्ठ जीवन की नींव उनकी जननी ने ही रखी है ।

हाँ माँ तु यदि निर्धार करे तो जरूर कर सकती है ।