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गर्भावस्था और भोजन

‘माता’ बनना हर स्त्री के जीवन का सबसे रोमांचक और अविस्मरणिय अनुभवो से भरा समय है । परंतु इस समय को और भी सुंदर बनाया जा सकता है, जो वैदिक और वैज्ञानिक तरीके से सिध्ध हुई कुछ बातो का ध्यान रखा जाएँ ।

वैज्ञानिक प्रयोगो से भी यह साबित हुआ हे कि गर्भस्थ स्त्री जो भी भोजन ग्रहण करती है, उसकी गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी शारीरिक और मानसिक असर होता है । हमारें यहाँ पूरानी कहावत है “जैसा अन्न वैसा मन” इसलिए तो रानी कौशल्या ने अपने गर्भावस्था के दौरान राजमहेल का भोजन का त्याग किया । अहोहो….. यह क्या । राजमहेल का भोजन का त्याग । महाराज दशरथ चिंता में पड़ गए । दशरथ महाराज को जान-पडताल करते यह पता चला कि रानी ने महल के भोजन का त्याग इसलिए किया कि महल में तो समग्र राज्यमें से अन्नसामग्री संचित की जाती है । यह अन्न सामग्री किसने, कैसे और कैसी भावना से दिया उसका कोई पता नहीं और यह अन्न ग्रहण करने से आनेवाले बच्चे पर विपरीत असर पड़ सकता है । कौशल्या राणीने समग्र गर्भावस्था दौरान ऋषिवर वशिष्ठ के आश्रम से आया हुआ भोजन ही ग्रहण किया । उसके बदले में राणी ने आश्रम की कन्याओं को विद्यापाठ कराया । इस पर से कह सकते है कि रानी ने अपनी मेहनत के फल स्वरूप प्राप्त सात्विक भोजन ही ग्रहण किया । एसा सात्विक और मेहनत से प्राप्त भोजन ग्रहण करने से बच्चे के मन का सात्विक विकास हुआ जो शायद राजमहल के भोजनन से न होता । इस तरह श्रीराम का श्रेष्ठ विकास हुआ ।

कितनी पवित्र और शुद्ध भावना । क्या आज के आधुनिक युग में एसी विचारधारा की जरुरत नहीं है । बाहर के कोई भी रेस्टोरां या भारी बना हुआ भोजन किस तरह और कैसी भावना से बना होगा यह कोई भी निश्चित नहीं बता सकता । जो आज भी गर्भवती स्त्री निर्धार करे कि वह अपने समग्र गर्भावस्था दौरान घर में पका हुआ शुद्ध और सात्विक भोजन ही ग्रहण करेगी तो आनेवाले बच्चे के तन और मन पर निश्चित रुप से फायदा होगा ।

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