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हा, माँ जो निर्धार करे वह कर सकती है

मातृत्व शब्द सुनते ही ममता का अनुभव होता है । पर यह मातृत्त्व केवल नव महिने की भावनाओं का अवसर नहीं है एक औरत जब बाल्यावस्था में होती है तब से ही वह माँ होती है । कभी खिलोने की गुडियाँ पर प्रेम बरसाती हुई, तो कभी अपने भाई-बहन पर, तो कभी तो अपने पिता पर । आज के वुमन एम्पावरमेन्ट के जमाने में हर स्त्री को यह याद रखने की जरुरत है कि उपरवाले ने तुम्हे स्त्री होने के गौरव प्रदान किया है । सर्जन करने की क्षमता देकर पर्मेश्वर आपको उसके समकक्ष होने का दरज्जा दिया है । एक आत्मा दूसरी आत्मा को महसूस कर सके, और उस आत्मा को शरीर दे सके एसा अलौकिक कार्य मात्र भगवान और औरत ही कर सकते है । गर्भ में पल रही आत्मा मेरी संतान है । वाह… क्या अद्‌भूत अनुभूति है । मातृत्व दुनिया की हर एक औरत के लिए एक जैसा ही आनंददायी अनुभव है, फिर चाहे वो धनवान हो या गरीब ।

श्रेष्ठ, सशक्त, गुणवान और बुद्धिमान संतान जगत को भेंट देना वो एक औरत की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है । प्राचीन युग में निर्बल संतान को जन्म देना – वह भी एक पाप कहलाता था । इसलिए संतान तेजस्वी, शूरवीर और पराक्रमी हो उसके लिए गर्भावस्था दौरान ही खास प्रयास किए जाते है । आज की नारी तो शिक्षित आधुनिक और पुरुष के समकक्ष है । आहार, विहार और विचार में जो संयम रखा जाए और निश्चित संस्कारो का सिंचन गर्भावस्था से ही किया जाए तो माता विश्व को उच्चकोटी की संतान निश्चय ही भेंट दे सकती है ।

श्रीकृष्ण की बाते माता सुभद्रा के गर्भ में ही सुनकर, सीखकर क्या छोटी उम्र में ही अभिमन्यु ने चक्रव्यूह को नही भेदा । यदि माता जीजाबाई ने निर्धार न लिया होता कि मेरे गर्भ का बालक शूरवीर और पराक्रमी बने, तो शिवाजी जैसे शूरवीर भारत देश को मिल पाते ? पूतलीबाई ने संतान महात्मा गाँधी से लेकर हीराबा ने सुपुत्र ऐसे भारत के वर्तमानकालिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रभाई मोदी सहित सभी महान हस्तीयाँ के जीवन में झाँकी की जाए तो पता चलता है कि उसके श्रेष्ठ जीवन की नींव उनकी जननी ने ही रखी है ।

हाँ माँ तु यदि निर्धार करे तो जरूर कर सकती है ।

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